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Thursday, January 2, 2014

क्या आप (AAP) दूसरी राजनीतिक दलो से अलग है?


क्या आप (AAP) दूसरी राजनीतिक दलो से अलग है?
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पिछले 7-8 दिनों में 'आप' और अरविंद केजरीवाल के बारे में बहुत सी बातें साफ हो गई हैं। दिक्कत केवल यह है कि मीडिया के जयकारे में वे साफ बातें भी इतनी धुंधली दिख रही हैं कि दिमाग उनको मानने को तैयार नहीं है। बिजली और पानी पर आम आदमी पार्टी के वादों की बात हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी ने 72 घंटे के भीतर दोनों वादे पूरे कर दिए। लेकिन क्या यह पार्टी सत्ता में केवल इन्हीं वादों के कारण आई थी? क्या देश में इसे लेकर जो जिज्ञासा और उत्साह पैदा हो रहा है, वह केवल इन्हीं वादों के कारण है?
दरअसल, आप ने अपनी पोजिशनिंग  राजनीतिक पार्टी के तौर पर की ही नहीं थी। यह एक आंदोलन था, जिसने तंत्र की शुचिता की बात की। वीआईपी कल्चर खत्म हो, सिस्टम का भ्रष्टाचार खत्म हो, सिस्टम को सिरे से बदला जाए- जैसे नारों ने लोगों को एक ताजी राजनीतिक धारा की उम्मीद बंधाई क्योंकि लोकलुभावने वादे और सरकारी खजाने को लुटा कर रॉबिन हुड बनने वाले वादे भारतीय राजनीति में नए नहीं हैं।

अब देखिए,सरकार बनने के बाद से 'आप' नेताओं और अरविंद केजरीवाल के बयान सुनिए, प्राथमिकताएं देखिए। मेट्रो से शपथ ग्रहण में जाने का ड्रामा कर पहले केजरीवाल जी ने साबित किया कि वह गांधी या पटेल नहीं, बल्कि (लालू जी,मायावती जी,ममता जी, मुलायम जी बहुत से हैं ) नेता ज्यादा हैं, जिसे अपने प्रचार  प्रॉपेगैंडा के आगे राष्ट्रीय संपत्तियों के नुकसान और उसकी सुरक्षा से कोई खास सरोकार नहीं है। 

28 दिसंबर को 'आप' सरकार के शपथ लेने के बाद से क्या हो रहा है। थोक में प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले किए गए, जैसा कि हर सत्ता परिवर्तन पर होता है। साफ है कि इनतबादलों का भ्रष्टाचार या कार्यकुशलता से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि ये केजरीवाल साहब के एक पसंदीदा अधिकारी (जिन्हें उन्होंने पद संभालते ही अफसरशाही की सबसे ऊंची कुर्सी दी है) की सिफारिशों पर किए गए। लाल बत्तियों पर रोक लग गई। लेकिन  उन्होंने कोई ऐसे संकेत नहीं दिए कि वह वीआईपी संस्कृति का गला घोंटना चाहते हैं, न ही उन्होंने पुलिस या बाबुओं को ऐसा कोई संदेश  दिया।  क्या इतने से वीआईपी कल्चर खत्म हो जाएगा। नियम तोड़ने पर अपने बाप, भाई, मामा, ताऊ की धौंस देकर पुलिस पर रौब गांठने वाले क्या लाल बत्ती से चलते हैं? सचिवालय से से सुरक्षा हटा ली गई। अगले दिन फिर समझ में आया कि गड़बड़ हो गई, तो ऐसी सुरक्षा हुई कि मीडिया तक को अंदर जाने से रोक दिया गया। 

अब देखें, दो सबसे बड़े वादे, जिन्हें 72 घंटों में पूरा कर इतिहास रचा गया है। पहले पानी की बात। दिल्ली में पानी को लेकर समस्या क्या है? पानी का महंगा होना... पानी का नहीं होना? 37 लाख घरों में से करीब 17.5 लाख घरों में पानी नहीं आता। ये घर ग़रीब हैं, अनधिकृत कॉलोनियों में बने हैं या फिर झुग्गियों में हैं। वहां रोज टैंकरों से पानी आता है, जिससे अपना हिस्सा पाने के लिए वहां के बाशिंदों को गाली-गलौच, झगड़े और संघर्ष से रोज़ जूझना पड़ता है। आप ने मुफ्त पानी का वादा किया था... दे दिया।

दूसरा, बिजली। बिजली आधी कीमत में ही क्यों, मुफ्त भी दी जा सकती है। सवाल यह है कि इसका मॉडल क्या है। क्या सब्सिडी पर कोई चीज़ फ्री देना समस्या का समाधान है... या वह आज की समस्या को कल पर टालना है। फिर सब्सिडी का राजस्व, जनता के टैक्स से ही वसूला जाता है। तो आखिर उसका बोझ तो जनता पर ही आना है।

मुफ्त पानी की घोषणा के साथ या बाद, कहीं पाइपलाइन बिछाने की जल्दबाजी या प्राथमिकता नहीं दिखी... सब्सिडी से बिजली सस्ती करना तो उसी लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा है, जो कांग्रेस, बीजेपी, सपा या अन्नाद्रमुक अपने-अपने राज्यों में कर रहे हैं। सब्सिडी किसी नेता के पिताजी के खाते से नहीं आती, जनता से ही वसूली जाती है। 

अब मेरे दोस्तों आप ही बताओ " आप " कैसे दुसरो से अलग हैं ?
मेरा तो यही विचार हैं, नही आपलोगो का अलग हो सकता हैं |
                                                                                                                               
विजय कुमार
शुभकामनाओं के साथ जयहिन्द! (02-01-2014)

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